श्योपुर विवाद का असर पूरे प्रदेश पर: अब इस हाईकोर्ट में इतने जिलों की इतनी याचिकाएं; नगर पालिका अध्यक्षों के अधिकारों पर संकट
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
श्योपुर नगर पालिका अध्यक्ष चुनाव विवाद अब पूरे मध्य प्रदेश में फैलता नजर आ रहा है। इस मामले की गूंज अब इंदौर हाईकोर्ट तक पहुंच चुकी है, जहां इंदौर-उज्जैन संभाग के 8 जिलों की नगर पालिकाओं से जुड़ी 15 याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में अध्यक्षों के चुनाव और उनके वित्तीय अधिकारों को चुनौती दी गई है।
नोटिफिकेशन विवाद से शुरू हुआ पूरा मामला
विवाद की जड़ नगर पालिका अध्यक्ष चुनाव के लिए अधिसूचना (नोटिफिकेशन) जारी न होना है। आरोप है कि बिना आधिकारिक नोटिफिकेशन के ही अध्यक्षों का निर्वाचन कर दिया गया, जिससे पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
ग्वालियर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की
इस मुद्दे पर पहले ग्वालियर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए मुख्य सचिव से लेकर चंबल संभागायुक्त तक को फटकार लगाई। कोर्ट ने देरी को “बेंच हंटिंग” और न्यायालय के साथ “छल” तक करार दिया।
पानसेमल से शुरू हुई कानूनी लड़ाई
इस विवाद की शुरुआत पानसेमल (बड़वानी) से हुई, जहां राधिका सतोते ने नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव को चुनौती दी। 2 मई 2024 को इंदौर हाईकोर्ट ने इस मामले में अध्यक्ष के वित्तीय अधिकारों पर रोक लगा दी थी। बाद में संशोधित नगर पालिका अधिनियम का हवाला देते हुए बिना नोटिफिकेशन चुनाव को अवैध बताया गया।
इन जिलों की नगर पालिकाएं घिरीं विवाद में
अब यह मामला इंदौर-उज्जैन संभाग के 8 जिलों तक फैल चुका है। इनमें शामिल हैं- उज्जैन, खरगोन, देवास, धार, आगर-मालवा, रतलाम, राजगढ़ और बड़वानी। इन जिलों की 15 नगर पालिकाओं से जुड़े मामलों में मार्च 2026 के दौरान याचिकाएं दायर की गई हैं।
कई जगह वित्तीय अधिकारों पर रोक
कुछ मामलों में हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए अध्यक्षों के वित्तीय अधिकारों पर रोक भी लगा दी है। जावरा, नागदा और सोनकच्छ नगर पालिकाओं में यह रोक लागू की जा चुकी है, जबकि अन्य मामलों में राज्य सरकार से जवाब मांगा गया है।
6 अप्रैल की सुनवाई बेहद अहम
इन सभी 15 याचिकाओं पर 6 अप्रैल को इंदौर हाईकोर्ट में सुनवाई संभावित है। यह सुनवाई इसलिए बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि कोर्ट का फैसला पूरे प्रदेश की नगर पालिकाओं को प्रभावित कर सकता है।
इन पर पड़ सकता है असर
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, इस मामले का असर मध्य प्रदेश की करीब 98 नगर पालिकाओं और 247 नगर परिषदों पर पड़ सकता है, जिससे अध्यक्षों की कुर्सी और अधिकार दोनों संकट में आ सकते हैं।
क्या रही प्रशासनिक चूक?
दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में ओबीसी आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। बाद में राहत मिलने के बाद राज्य चुनाव आयोग ने जल्दबाजी में नगरीय निकाय चुनाव कराए।
यह चूक अब बड़े कानूनी विवाद का कारण
चुनाव परिणामों की अधिसूचना तो जारी हुई, लेकिन नगर पालिका अध्यक्षों के निर्वाचन की औपचारिक अधिसूचना राज्य सरकार के शहरी विकास विभाग द्वारा जारी नहीं की गई। यही चूक अब बड़े कानूनी विवाद का कारण बन गई है।
श्योपुर केस में सरकार की उलझन बढ़ी
श्योपुर मामले में पहले सरकार ने कोर्ट में कहा कि नोटिफिकेशन जारी ही नहीं हुआ, इसलिए याचिका मान्य नहीं है। इस पर कोर्ट ने वित्तीय अधिकारों पर रोक लगा दी।
सरकार ने बदला रुख
बाद में सरकार ने अपना रुख बदलते हुए कहा कि नोटिफिकेशन की आवश्यकता ही नहीं है। इस विरोधाभासी रुख पर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब किया।
पूरे प्रदेश पर असर की आशंका
अब इंदौर हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई और ग्वालियर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बीच यह मामला राज्य सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आने वाले दिनों में कोर्ट का फैसला न सिर्फ श्योपुर, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों की व्यवस्था और वैधता को प्रभावित कर सकता है।
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